मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य
परोपकार - मानव जीवन का लक्ष्य
सेवा-परोपकार को जीवन का लक्ष्य बनाकर जीवन जिएँ तो मनुष्यता की सार्थकता कही जा सकती है। संसार में परोपकार का अर्थ है धन का दान करना, बड़े अस्पताल या स्कूल बनवाना, समाज सेवा करना ऐसा माना जाता है। लेकिन परोपकार का सच्चा अर्थ है अपने मन, वाणी और व्यवहार को दूसरों के हित के लिए उपयोग करना। प्रत्येक परोपकारी प्राणी जो दूसरों के लिए जीता है, उसे कभी दुःख नहीं पड़ता। उल्टा उसका आंतरिक सुख ही बढ़ता जाता है।
परोपकार में गरीबों की मदद करना, बीमार लोगों की देखभाल करना, माता-पिता, बुजुर्गों और गुरु की सेवा करना वह सब उसमे समां जाता है। साथ ही अपने कौशल, योग्यता, बुद्धि का उपयोग करके दूसरों की मदद करना, जो मुसीबत में है उसे सही सलाह देना भी परोपकार है। परोपकार का मतलब बड़े-बड़े काम करना ही नहीं है। परोपकार की शुरुआत छोटे-छोटे कदमों से होती है जैसे किसी पड़ोसी को किसी चीज की ज़रूरत हो तो उसके लिए चक्कर लगाएँ, खरीदारी के लिए जाते समय दूसरों की जरूरत की चीज ले आएँ, पैदल जा रहे किसी व्यक्ति को गाड़ी में लिफ्ट दे दें, घर के काम में परिवार की मदद कर दें। दूसरों को सुख नहीं दे सकते तो कोई बात नहीं, लेकिन जिंदगी इस तरह जीना कि किसी को थोड़ा सा भी दुःख न हो, यह भी एक बड़ा उपकार है।
परोपकार के पीछे उद्देश्य का बहुत महत्व है। मान, कीर्ति या लक्ष्मी की आशा से नहीं, बल्कि शुद्ध भावना से किया गया परोपकार पुण्य बाँधता है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि जो दूसरों के लिए सोचता है उसे अपने लिए सोचने की जरूरत नहीं होती, क़ुदरत उसका सब कुछ संभाल लेती है। जो बच्चे अपने माता-पिता की सेवा करते हैं, उन्हें जीवन में कभी बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता है, उनकी सभी आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं और आत्म-साक्षात्कारी गुरु की सेवा करते हैं, तो उन्हें मोक्ष मिलता है।
परम पूज्य दादाश्री ने अपने पूरे जीवन का यही लक्ष्य रखा था कि जो मुझसे मिले, उसे सुख होना ही चाहिए।अपने सुख के बारे में तो कभी विचार तक नही किया था। बस, सामनेवाले को क्या समस्या है और उसे कैसे दूर किया जा सकता है, यही भाव उन्हें सदैव रहता था। परम पूज्य दादा भगवान की वह भावना अंततः कारुण्यता में रूपांतरित हुई और परिणाम स्वरूप अद्भुत आध्यात्मिक विज्ञान प्रकट हुआ।
यहां हमें सेवा-परोपकार का लक्ष्य जीवन में क्यों रखना चाहिए और इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इसकी सच्ची समझ सरल भाषा में, सटीक उदाहरणों के साथ मिलती है।


दान और धर्मादा
पुण्य कमाने के अनेक मार्गों का धर्म के शास्त्रों में और धर्मगुरुओं ने बताए हैं। उनमें से एक मार्ग है, दान!
दान देने की प्रथा तो मनुष्य के जीवन में बचपन से अपनाई जाती है। बच्चा छोटा हो, तभी से माता-पिता उसे मंदिर या धर्मस्थलों में ले जाएँ तो बाहर गरीब लोगों को पैसे दिलवाते हैं, खाना दिलवाते है, मंदिर या धर्मस्थलों में दान की पेटी में पैसे डलवाते हैं। इस प्रकार बचपन से ही मनुष्य को दान के संस्कार मिलते ही रहते हैं।दान का महत्व क्या है? सच्चा दान कैसा होता है? दान देते समय कैसे भाव रखने चाहिए? दान किस-किस प्रकार से हो सकता है? सबसे ऊँचा दान कौन-सा है? दान किसे और कितना देना चाहिए? वगैरह अनेक दान से संबंधित समझ परम पूज्य दादाश्री की ज्ञानवाणी द्वारा बही है। दान देते समय यदि अंदर की अजागृति हो तो देकर भी कैसे खोट खाते हैं, उसका सूक्ष्म निरूपण उन्होंने किया है। इस समझ को संक्षिप्त रूप में उदाहरण के साथ यहाँ दर्शाया गया है, जो वाचक को दान देने में मार्गदर्शन प्रदान करेगा।




व्यवसाय में नैतिकता
मनुष्य व्यवसाय या रोजगार करता है, लेकिन उसका उद्देश्य क्या होता है? पैसे कमाने का। उसमें भी सभी को फायदा ही चाहिए, नुकसान के लिए कोई धंधा नहीं करता। पैसे कमाने के पीछे हर किसी का उद्देश्य जीवन का गुजारा करना और सुखी होना है। लेकिन क्या पैसों से सुखी हो जाते हैं?
लोग पूरा दिन पैसे कमाने के लिए दौड़-धाम करते रहते हैं। पैसों के पीछे तो पूरा जगत पागल हो गया है। उसके बावजूद भी सुख नहीं आता। बड़े-बड़े बंगले, कारें, नौकर सब कुछ होने के बावजूद भी उसे भोगतने का किसी के पास समय नहीं है, क्योंकि पैसे कमाने की रेस में वे दौड़ते ही रहते हैं।
इतना ही नहीं, आजकल व्यवसाय या रोजगार करते समय कैसे करके जल्दी से पैसा कमा लें, उसकी दौड़ शुरू हो गई है। इस दौड़ में ऐसा अंधापन आ जाता है कि लोगों को हित–अहित का भी भान नहीं रहता। पैसे कमाने की लालच के कारण चीजों में मिलावट, अनीति, भ्रष्टाचार, काला धन आदि दूषण व्याप्त हो गए हैं।
इस काल में, जबकि ज़्यादातर बिजनेस मेन अधोगति के बीज बो रहे हैं, तब मनुष्य किस समझदारी से इस जोखिमदारी से छूट सके और उसका जीवन व्यवहार भी सुरक्षित रह सके, उसकी समझ यहाँ स्पष्ट की गई है।

शांतिपूर्ण सुबह

